आज नवरात्रि का पाँचवाँ दिन है और इस दिन हम माता स्कंदमाता की आराधना करते हैं। नवरात्रि का प्रत्येक दिन हमें एक नई दिशा और प्रेरणा देता है, और आज का दिन मातृत्व, करूणा और संरक्षण की भावना को जागृत करने वाला है। माता स्कंदमाता का नाम ही उनके स्वरूप का परिचय देता है। "स्कंद" यानी भगवान कार्तिकेय और "माता" यानी उनकी जननी। माता स्कंदमाता वही दिव्य शक्ति हैं जिन्होंने भगवान स्कंद को जन्म दिया और उन्हें गोद में लेकर संसार की रक्षा का संकल्प लिया। उनका स्वरूप अत्यंत शांत और दिव्य है। वे कमल पर विराजित होती हैं और उनकी गोद में भगवान स्कंद बालरूप में उपस्थित रहते हैं। उनके मुखमंडल पर मातृत्व की कोमलता और नेत्रों में असीम करूणा का भाव सदैव झलकता है।

माता स्कंदमाता का जीवन और स्वरूप हमें बहुत कुछ सिखाता है। वे इस बात की प्रतीक हैं कि मातृत्व केवल जन्म देने तक सीमित नहीं है, बल्कि पालन-पोषण, संरक्षण और मार्गदर्शन की जिम्मेदारी भी उसी का हिस्सा है। उनका संपूर्ण जीवन निस्वार्थ त्याग, करूणा और सेवा का उदाहरण है। यदि हम उनके गुणों को अपने जीवन में उतारें तो हम अपने परिवार में प्रेम और एकता बनाए रख सकते हैं, समाज में भाईचारे और सहयोग की भावना को बढ़ा सकते हैं और अपने देश को नैतिकता और संस्कृति के बल पर नई ऊँचाई तक पहुँचा सकते हैं।

आज के समय में माता स्कंदमाता का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। जिस प्रकार उन्होंने अपने पुत्र भगवान स्कंद को असुरों से युद्ध करने के लिए तैयार किया, उसी प्रकार हमें भी अपने बच्चों और युवाओं को सही मार्गदर्शन देकर राष्ट्रनिर्माण की ओर अग्रसर करना होगा। जिस प्रकार उन्होंने अपनी करूणा से संसार का संरक्षण किया, उसी प्रकार हमें भी निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करनी होगी।

मैं मानता हूँ कि यदि हम माता स्कंदमाता की शिक्षाओं को आत्मसात करें तो न केवल हमारा परिवार सुख-शांति से भरा होगा, बल्कि हमारा समाज और देश भी प्रगति और समृद्धि की ओर अग्रसर होगा। नवरात्रि का यह पर्व केवल उपवास और पूजा का समय नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन का अवसर भी है। आज जब हम माता स्कंदमाता के चरणों में नमन करें, तो प्रार्थना करें कि वे हमें त्याग, करूणा और निस्वार्थ सेवा का बल प्रदान करें ताकि हम अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें और समाज एवं राष्ट्र की भलाई में योगदान दे सकें।

जय माँ स्कंदमाता!